राष्ट्रभाषा महाविद्यालय

       भाषा का प्रचार करने वाली संस्था का यह कर्तव्य ओंर दायित्व होता है कि वह उस भाषा के शिक्षण की समुचित व्यवस्था करे | हिन्दी शिक्षक और हिन्दी प्रचारक तैयार करने की लिए समिति ने सन् १९३७ में ही ‘राष्ट्रभाषा अध्यायन मंदिर ‘ की स्थापना की थी, जो सन् १९४२ तक चलती रही | इस अध्यापन मंदिर से निकले हुएं प्रचारकों ने अपने-अपने प्रदेश में जाकर हिन्दी प्रचार- प्रसार का स्तुत्य कार्य किया है |

     प्रचारक और योग्य शिक्षक तैयार करने के लिए समिति ने ‘राष्ट्रभाषा रत्न’ परीक्षा चलाई थी | हजारो की संख्या में भाई-बहनों ने इस परीक्षा में बैठकर उसे उत्तीर्ण कर अपने को योग्य शिक्षक बनाया था | वे अपने-अपने स्थान पर यथाशक्ति हिन्दी प्रचार के कार्य में अपना सहयोग दे रहे थे |  

फिर भी भारत के विभिन्न प्रदेशों से और विदेशों से भी यह माँग होती रही की वर्धा में एक ऐसे विद्यालय और महाविद्यालय की व्यवस्था होनी चाहिए, जहाँ विभन्न प्रान्तों और विदेशों से भी विद्यार्थी हिन्दी का विधिवत् अद्ययनकर सकें | इसके लिए १८ जनवरी, १९५१ को राष्ट्रभाषा भवन का शिलान्यास ‘राजर्षि श्री पुरुषोत्तमदास टन्डन जी’ के हाथो किया गया और फिर सन् १९५२ में इस राष्ट्रभाषा महाविद्यालय की स्थापना की गई | इस महाविद्यालय में राष्ट्रभाषा रत्न और अध्यापन-विशारद परीक्षा की पढाई की व्यवस्था की गई | प्रथम वर्ष में ५ विद्यार्थी शामिल हुए , जिनमें उड़ीसा से एक, बंगाल से एक, महाराष्ट्र से दो और विदर्भ से एक विद्यार्थी थे, इनमे तिन छात्र और दो छात्राएँ थी |

       राष्ट्रभाषा महाविद्यालय का कार्य निरंतर चलता रहा, जिसमे विभिन्न प्रान्तों से विद्यार्थी आते रहे बल्कि मारीशस के भी कई भाई-बहन तथा जापान के भाई-बहन आदि ने महाविद्यालय में शिक्षा पाकर राष्ट्रभाषा –रत्न परीक्षा उत्तीर्ण की |