राष्ट्रभाषा पुस्तकालय

pustkalay

शिक्षा और साहित्य से सम्बन्ध रखनेवाली संस्था के लिए एक अच्छा पुस्तकालय आवश्यक हुआ करता है । सन् 1936 में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति अस्तित्व में आई थी और जुलाई, 1937 से राष्ट्रभाषा अध्यापन मंदिर शुरू हुआ था। शिक्षकों, विद्यार्थियों, प्रचारकों और समिति कार्यालय को भी सन्दर्भ के लिए पुस्तकों की आवश्यकता अनुभव की गई और सन् 1937 से ही मराष्ट्रभाषा पुस्तकालयफ का श्रीगणेश हुआ । पुस्तकालय की व्यवस्था का भार अध्यापन मंदिर के शिक्षक श्री रामेश्‍वर दयाल दुब े को सौंपा गया । प्रारंभ में मात्र 59 पुस्तकें थीं, धीरे-धीरे पुस्तकों की संख्या बढ़ती गई ।  आज पुस्तकालय में 30 हजार के आसपास पुस्तकें हैं। करीब 58 पत्रिकाएँ तथा 18 दैनिक समाचार-पत्र  नियमित रूप से आते हैं जिसका लाभ विद्यार्थीगण, वर्धावासी एवं बाहर के पाठक उठाते हैं। जैसे-जैसे राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का विकास होता गया, पुस्तकालय के आकार में भी वृद्धि होती गई । अब इस पुस्तकालय का उपयोग वर्धा शहर के हिन्दी प्रेमी जनता भी करने लगी है। हिन्दी विश्‍वविद्यालय, एम. ए. तथा पी-एच. डी. या शोध करनेवाले लोग इस पुस्तकालय का भरपूर लाभ उठाते हैं। शहर में यह साहित्य-शोध का पुराना अच्छा पुस्तकालय माना जाता है।